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Saturday, April 25, 2020

महर्षि मनु के मांसाहार के समर्थक थे या विरोधी?

 स्वामी सत्यानंद महाराज 'सत्य'
 दार्शनिक एवं प्रवचन कर्ता
संस्थापक - विश्व हिंदू सत्य शोधक मिशन 
नेट ,पी.एच.डी., एम. ए.( दर्शनशास्त्र, इतिहास, हिन्दी साहित्य, राजनीति विज्ञान) डी. एड.


क्रांतिकारी: शोध पत्र
( इस शोधपत्र का उद्देश्य हिंदू समाज को अपने धर्म-दर्शन-इतिहास के यथार्थ ज्ञान से अवगत करवाना है, न कि किसी की भावना को ठेस पहुँचाना या वाद- विवाद करना!  सभी विवाद केवल सिविल न्यायालय, सारंगपुर, जिला- राजगढ़ (ब्यावरा) MP  में ही मान्य होंगे!) 

हिंदू ( ब्राह्मण)  कानून या आचरण या धर्म की सर्वमान्य पुस्तक- मनुस्मृति है! जब हम मनुस्मृति को पढ़ते हैं, तब हमें उसमें हिंदुओं ( द्विजों ) को मांसाहार  करना चाहिए या नहीं, इस विषय पर परस्पर विरोधी श्लोक दिखाई देते हैं! इन्हें देखकर आम पाठक तो क्या बड़े- बड़े विद्वान भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं? बेचारा भोला-भाला हिंदू किसे सच  माने???

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हम जब माँ के गर्भ में होते हैं, तब हमें अपनी माता के खून या रक्त से ही पोषण मिलता है! मानवजाति आदिम सभ्यता से ही  सर्वभक्षी रही है, जैसे- जैसे मनुष्य सभ्य होने लगा वैसे-वैसे खान-पान के नियमों का निर्धारण होने लगा! और कुछ चीजों को खाना पाप- पुण्य पवित्र -अपवित्र घोषित करने लगा!!

चूंकि आदि मानव मांसाहारी था, वह जब सभ्य हुआ तब वह अपने खान- पान की चीजों को अपने कल्पित देवी- देवताओं या ईश्वर को चड़ाने  या भेंट करने लगा! यहीं से बलिप्रथा का जन्म हुआ, जो आज भी विश्व समाज में किसी न किसी रूप में प्रचलित है!

हमारे ब्राह्मण धर्म में भी पशु बलिप्रथा की हमारी सनातन परम्परा है, हमारे सारे शास्त्र इसका समर्थन करते हैं, मगर जब भारत में जैन धर्म और बौद्ध धर्म ने बलिप्रथा का घोर विरोध किया, तब हमें मजबूरी में शाकाहारी बनना पड़ा और शास्त्रों में पशुबलि और मांसाहार के विरोध में श्लोक जोड़ने पड़े!!

इतना सब होने के बावजूद कश्मीरी ब्राह्मण, बंगाली ब्राह्मण, उड़ीसा का ब्राह्मण और कोंकणी या चित्तपावन ब्राह्मण मांसाहारी ही रह गया!!

आपको आश्चर्य होगा कि आधुनिक युग में हिंदू या ब्राह्मण धर्म के सबसे बड़े प्रचारक स्वामी विवेकानंद जी ( बंगाली कायस्थ) और उनके गुरू रामकृष्ण परमहंस( बंगाली ब्राह्मण), हिंदुत्व की आधुनिक फासीवादी नाजीवादी दक्षिणपंथी विचारधारा के जनक  सावरकर जी ( चित्तपावन महाराष्ट्रीयन ब्राह्मण) और भारतरत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (ब्राह्मण) देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ( कश्मीरी ब्राह्मण) ये सभी ब्राह्मण देवता मांसाहारी थे!

ब्राह्मण विद्वान शास्त्रों में उल्लेखित मांसाहार संबंधी श्लोकों पर  दो भागों में बंटे हुए हैं, कुछ विद्वान शास्त्रों में आए बलिप्रथा या मांसाहार के समर्थक श्लोकों को मूल श्लोक मानते हैं और कुछ विद्वान या तो इनके अर्थ बदल देते हैं या फिर प्रक्षिप्तवाद ( बाद की मिलावट) कहकर  वाममार्गीयों,  वामपंथियों, मुगलों, मुसलमानों या अंग्रेजों के मत्थे सारा दोष मढ़ देते   हैं!!??

किसी प्रथा के प्रचलन के बाद ही उसका विरोध या खंडन संभव है!

हमारी इसी बात का समर्थन करते हुए मनुस्मृति के  महान अनुशीलन या अनुसंधान कर्ता आर्यसमाजी विद्वान डॉ प्रो सुरेन्द्र कुमार पूर्व कुलपति गुरूकुल  कांगड़ी  लिखते हैं-

" विधान मौलिक और खंडन उसकी प्रतिक्रिया में होता है! " मनुस्मृति का पुनर्मुल्यांकन पृ-95

" किसी बात के अस्तित्व के बाद ही उसका खंडन हो सकता है, इस ( नियोग प्रथा के) खंडन से यह स्पष्ट है  कि इससे पूर्व यह मान्यता प्रचलित थी! " मनुस्मृति अध्याय 9 पृ- 759

डॉ सुरेन्द्र कुमार नियोग प्रथा का खंडन करने वाले श्लोकों को बाद की मिलावट मानते हैं, मगर यही सिद्धांत वे बलिप्रथा या मांसाहार के खंडन परक श्लोकों पर लागू नहीं करते हैं क्यों? इसका कारण है उनके (या मेरे प्रथम) गुरू महर्षि दयानंद सरस्वती जी गुजराती ब्राह्मण होने के कारण शाकाहारी थे, अतः शास्त्रों में आए मांसाहार या बलिप्रथा समर्थक श्लोकों को उन्होंने वाममार्गीयों के माथे मढ़ दिये!!! यदि महर्षि दयानंद जी बंगाली ब्राह्मण होते, तब  ये मांसाहार समर्थक सारे श्लोक मूल श्लोक बन जाते और मांसाहार या बलिप्रथा के विरोधी श्लोकों को जैनियों-बौद्धों  या शाकाहारियों के माथे मढ़ देते!!

हम जिस देश काल परिस्थिति में रहते हैं, वैसे ही चश्में से हम धर्म-दर्शन- इतिहास की व्याख्या करते हैं! बुद्धिमान पाठक समझ ही गए होंगे क्या सच है? क्या झूँठ है?

आइए पहले  हम मांसाहार  या बलिप्रथा के समर्थक श्लोकों पर विचार करें और बाद में विरोधी श्लोकों पर चिंतन करते हैं!

1   मांसाहार, शराब और सेक्स  मनुष्य की स्वभाविक प्रवृत्ति है - महर्षि मनु

"न मांस खाने में कोई दोष है, न शराब पीने में और न किसी के साथ मैथुन करने में ही बुराई है, यह प्राणियों (मनुष्यों) का  स्वभाव ही है, किंतु इनका त्याग करना महान फल देने वाला है! अत: इन्हें त्याग देना चाहिए! " 56/5 मनुस्मृति  पृ 424 देखिए-

न मांस भक्षणए दोषो न मद्धये न च मैथुने!
प्रवृत्तिरेषा भूतानाम् निवृत्तिस्तु महाफला!! 56/5

मनु महाराज बड़ी मनोवैज्ञानिक बात कहते हैं, मानवजाति स्वभाव से ही शबाब, कबाब और शराब की दिवानी है, इसी कारण धरती पर ऐश करने के बाद उसे स्वर्ग या जन्नत  में भी अप्सराएँ, हूरें, शराब की नदियाँ और तरह-तरह के  कबाब या मांस चाहिए!

मनु महाराज कहते हैं कि जैनियों- बौद्धों ने सारा मजा किरकिरा कर दिया! संयम से रहो या फिर इन सबको त्याग दो तो और भी महाफल मिलेगा!!!??

2  हिंदुओं के लिए पड़ियन और रोहू मछली खाना धर्म है - महर्षि मनु
हव्य और कव्य के लिए समर्पित पाठिन और रोहू मछलियाँ खा लेनी चाहिए! राजीव, सिंहतुंड और सब काँटेदार मछलियों को भी इस विधि से खा लेना चाहिए! "16/5 मनुस्मृति पृ -413 देखिए-
पाठीन रोहिता वाद्धयौ हव्य कव्ययो: !
राजीवान्सिंहतुंडाश्च सशल्कांश्चैव सर्वश: !! 16/5 मनुस्मृति

3 यज्ञ के लिए पशुओं और पक्षियों को मारना धर्म है- महर्षि मनु
"ब्राह्मणों को यज्ञ के लिए उत्तम पशुओं और पक्षियों को मार लेना चाहिए और सेवकों के पालन-पोषण के लिए मार लें प्राचीन काल में महर्षि  अगस्त्य ने भी ऐसा ही किया था!" 22/5 मनुस्मृति,पृ -415 देखिए-

यज्ञार्थ ब्राह्मनैर्वध्या: प्रशस्ता मृग पक्षिण: !
भृत्यानाम् चैव वृत्यर्थ मगस्त्यो ह्याचरत्पुरा!! 22/5 मनुस्मृति

"क्योंकि पहले भी यज्ञों में और ब्राह्मण- क्षत्रियों के संयुक्त यज्ञानुष्ठानो में भक्ष्य( हलाल) कहे गये पशु और पक्षियों के पुरोडाश- यज्ञ के लिए निर्मल अन्न या हविष्यान्न  बने हैं! 23/5 मनुस्मृति पृ- 415

4  भक्ष्य ( हलाल) प्राणियों  ( पशु-पक्षियों) को खाना  पाप नहीं है - महर्षि मनु

 " खाने का अधिकारी मनुष्य भक्ष्य( शास्त्रों द्वारा अनुमोदित) प्राणियों को प्रतिदिन खाते हुए भी किसी पाप का भागी या दोषी नहीं होता, क्योंकि खाने के लिए और उनको खाने वालों को परमात्मा ने ही बनाया है!" 30/5 मनुस्मृति देखिए-

नात्ता दुष्यत्यदन्नाद्यान्प्राणिनो अहन्यहन्यपि!
धात्रैव सृष्टा ह्याद्याश्च प्राणिनोअत्तार  एव  च!! 30/5 मनुस्मृति  पृ- 416

यहाँ महर्षि मनु बड़ी वैज्ञानिक बात कहते हैं, एक दूसरे को खाने वाले  या कौन किसे खाएगा ?, यह खाद्य श्रृंखला तो प्रकृति या परमात्मा ने बनाई! यदि एक प्राणी द्वारा दूसरे प्राणी को खाना पाप या अधर्म होता, तब परमात्मा ऐसी खाद्या श्रृंखला बनाता ही क्यों जिसमें एक प्राणी को दूसरे को खाना पड़े!!!??

5  'देव विधि' से मांस खाना पुण्य है- महर्षि मनु
"यज्ञ के लिए मांस का खाना, यह ' देव विधि' (देवताओं का तरीका) मानी गयी है, इससे भिन्न विधि से मांस खाना तो ' राक्षस विधि' कही गयी है! " 31/5 मनुस्मृति पृ- 417 देखिए-

यज्ञाय जग्निधर्मान्सस्येत्येष दै वो विधि: स्मृत: !
अतोअन्यथा प्रवृत्तिस्तु राक्षसो विधि रुच्यते!! 31/5  मनुस्मृति

जैसे मुसलमान हलाल  मांस ही खाते है, अल्लाह को समर्पित करने के बाद! वैसे ही मनु महाराज कहते हैं  कि हिंदूओं (आर्यों) पहले यज्ञ या ईश्वर को समर्पित कर परमात्मा की प्रसाद स्वरूप मांस खाओ, यही देवताओं या धार्मिक लोगों का तरीका है, बाकि तरीके राक्षसी हैं! अधर्म है!!पाप है!!

6 देवताओं और पितरों को अर्पित करके मांस खाना पुण्य है! - महर्षि मनु
" खरीदकर अथवा स्वयं मारकर मांस तैयार करके अथवा दूसरे के द्वारा भेंट किये गये मांस को देवताओं और पितरों को अर्पण करके खाने में मनुष्य दोषभागी नहीं होता! " 32/5 मनुस्मृति पृ- 417 , देखिए-

कृत्वा स्वयं वाअप्युत्पाद्य परोपकृतमेव वा !
देवानिपतृश्चार्चयित्वा खादन्मांसं न दुष्यति!! 32/5 मनुस्मृति

7 मंत्रों से पवित्र किये बिना मांस खाना पाप है - महर्षि मनु
" ब्राह्मण को चाहिए कि कभी भी मंत्रों से पवित्र न किये पशु मांस को न खाए! सनातन विधि में आस्था रखकर मंत्रों से पवित्र किये गये मांसों को खाये! "36/5 मनुस्मृति  पृ- 417

8 जो मनुष्य श्राद्ध या मधुपर्क में मांस नहीं खाता, वह महापापी है! - महर्षि मनु
" जो मनुष्य यथा विधि श्राद्ध या मधुपर्क में समर्पित मांस को नहीं खाता है, मरकर इक्कीस जन्मों तक पशुओं का जन्म पाता है! " 35/5 मनुस्मृति पृ- 417

 नियुक्तस्तु यथा न्यायं यो मांसं नात्ति  मानव:!
स प्रेत्य पशुतां  याति  संभवानेक विंशतिम्!! 35/5 मनुस्मृति पृ- 417

 9 यज्ञ के लिए पशु हत्या करना, हिंसा नहीं 'अहिंसा' ही है ! - महर्षि मनु
"ब्रह्मा (ईश्वर) ने स्वयं पशुओं को यज्ञ के लिए ही बनाया और यज्ञ सबके कल्याण के लिए है, इस कारण से यज्ञ में 'पशु' आदि प्राणियों की हिंसा करना' 'अहिंसा' ही है! " 39/5 मनुस्मृति पृ- 418 देखिए-

यज्ञार्थ पशव: सृष्टा: स्वयमेव स्वयंभुवा!
यज्ञश्च भूत्यै सर्वस्य तस्माद्यज्ञे  वधोअवध : !! 39/5 मनुस्मृति

यही बात गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी अर्जुन को समझाते हैं कि आत्मा को काटा या मारा नहीं जा सकता, अत: धर्म के लिए युद्ध में अपने परिवार या रिश्तेदारों या दुश्मनों की हिंसा या हत्या करना पाप नहीं, पुण्य है!!
10 यज्ञ के लिए पशुओं को काटना पुण्य है, क्योंकि ऐसा करने से पशुओं को पशु योनि से जल्दी मुक्ति मिल जाती है! - महर्षि मनु

" औषधियाँ, पशु, वृक्ष, तिर्यक् योनि वाले सांप, कछुए आदि तथा पक्षी यज्ञ के लिए मृत्यु को प्राप्त होकर फिर उद्धार या उत्तम योनि को प्राप्त करते हैं! " 40/5 मनुस्मृति पृ- 418

" वेद के रहस्य को जानने वाला द्विज (ब्राह्मण) ऊपर वर्णित ( मधुपर्क में, यज्ञ में, श्राद्ध में और देव कर्म में 41/5) इन अवसरों में पशुओं की हिंसा करके अपने को और पशु को उत्तम गति प्राप्त कराता  है !" 42/5 मनुस्मृति पृ 419

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Monday, March 16, 2020

क्या आदिवासियों का मूल धर्म जैन है ?

गौरव जैन


भारत मेंं आदिवासियो की संख्या कुल जनसंख्या का लगभग 10% है जो लगभग भारत के सभी राज्यो में फैले है.  इनमे बंगाल , झारखंड , ओडिशा , छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, पूर्वोत्तर, गुजरात, दक्षिण राजस्थान में इनकी संख्या अधिक है.

आदिवासियो के धर्म को लेकर प्रारंभ से विवाद रहा है. उन्हें हिंदू, बौद्ध या क्रिश्चियन धर्मी बताया जाता है. पर उनके व्यवहार, आचरण, संस्कृति से वह इन धर्मो से दूर और  श्रमण जैन धर्म के बहुत करीब हैं.

आदिवासी क्षेत्रों  में प्राचीन काल में जैन धर्म का अत्यधिक प्रभाव था. जैन ग्रन्थो में भील, किरात सहित कई जनजातियों का उल्लेख मिलता है. यह प्राचीन काल में जैन थे.

जैन मुनि आचार्य वीरचन्द्र ने दक्षिण देश के विंध्यगिरि के पहाड़ी क्षेत्रों  में भिल्लक संघ की स्थापना की थी. यह संघ भील जैन श्रावकों का समूह था.

जैनों के सबसे बड़े तीर्थ सम्मेदशिखर के प्रति आज भी उस क्षेत्र की संथाल, भील जैसी जनजातियां श्रद्धा रखती है.

आदिवासी समुदाय के जैन होने का एक अकाट्य प्रमाण यह है कि आदिवासी क्षेत्र के जंगलो में प्रचुर मात्रा में तीर्थंकर मूर्तियों का होना. बंगाल से लेकर झारखंड, बिहार, ओडिशा, बस्तर, मध्यप्रदेश, पूरे दक्षिण प्रान्त में बड़ी संख्या में तीर्थंकर मूर्तियां  बिखरी हुयी हैं. आज के 50 वर्ष पहले शायद ही कोई ऐसा गांव  आदिवासी अंचल में रहा होगा जहां तीर्थंकर मूर्तियां नहीं थी.  धीरे-धीरे वह चोरी हो गई. कुछ जगह प्रवासी जैनों ने उन्हें वहां  से लाकर अपने मंदिरो में रखवा दिया. पर आज भी आदिवासी क्षेत्रो में तीर्थंकर मूर्तियां  बड़ी संख्या में मौजूद हैं. अगर आप  बस्तर, बंगाल के भ्रमण पर जाएंगे तब हर गांव  में जैन धर्म के अवशेष मिलेंगे.

जैन मुनि प्राचीन समय में जंगलो में ही विचरण करते थे. इस दौरान वह चातुर्मास के 4 माह का समय आदिवासियों  के बीच बिताते थे. मुनिगणों  के भोजन आदि की व्यवस्था यही वनवासी करते थे. यह परंपरा मुनिगणों के जंगल में रहने तक रही. जब जैन मुनि शहरों में विचरण करने लगे तब  आदिवासी समाज भी जैन धर्म व  उनके संस्कारो से दूर हो गया.

हडप्पा-मोहनजोदाड़ो सभ्यता से उत्खनन में मिले अवशेष जिनमे तीर्थंकर की नग्न मूर्तियां , आदिवासियों  से जुडे विशेष चिह्न आदि कई पुरावस्तुएं  जैनधर्म और आदिवासी सभ्यता को जोड़ती है.

पांडुलिपि शोधकर्ता, राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त प्रोफेसर राजाराम शास्त्री आरा बताते है,  "आचार्य भद्रबाहु जब दक्षिण भारत गए उस वक्त एक मुनिसंघ नाव के सहारे तमिल प्रान्त से अण्डमान निकोबार द्वीप भी गया था और वहां धर्मप्रचार किया. अण्डमान-निकोबार द्वीप प्रारंभ से ही विभिन्न आदिवासी जनजातियो का निवास स्थान रहा है.

तीर्थंकर पार्श्वनाथ और वर्धमान महावीर ने अपने साधना काल में आदिवासी क्षेत्रो का विचरण किया था व वहां  उनके बीच चातुर्मास भी किए. इस दौरान लाखों आदिवासी जैन परंपरा में दीक्षित हुए. तीर्थंकरो के राढ़ भूमि (आज का बंगाल,झारखंड) आदिवासी क्षेत्र में विहार का वर्णन आचारांग सूत्र में मिलता है.

बंगाल, ओडिशा, झारखंड की आदिवासी क्षेत्र की सराक, रंगिया, सदगोप जैसी जातियां  स्वयं को तीर्थंकरो की वंशज बताती है. उनके गोत्र आदि भी तीर्थंकरो के नाम पर ही है. यह लोग आज भी पूर्ण शाकाहारी है.

आदिवासी समुदाय आज अधिकतर मांसाहारी  है पर उनमें करुणा, दया की भावना भरपूर भरी है. जंगली जानवर व पेड़-पौधे उन आदिवासियो की दया व प्रकृति पूजा के कारण ही सुरक्षित हैं. यह करुणा, दया उनमें  जैनधर्म से आई है.

भीलों को नेपाल में आज भी श्रमण कहा जाता है. भील जनजाति और जैन-धर्म पर एक स्वतंत्र लेख लिखा जा सकता है.

राजस्थान में कुछ स्थानों पर मीना आदिवासी जैन-धर्म का पालन करते हैं.  इसी तरह गुजरात में भी परमार और राठवा आदिवासी जैन धर्म का पालन करते हैं.

आदिवासियो के मूल धर्म पर शोध हो तो भारत का इतिहास नई दिशा की ओर जा सकता है. पर आज इस तरफ अधिक ध्यान नहीं दिया जा रहा है. आशा है इस तरफ चिंतन होगा.

Sunday, March 8, 2020

अग्रवाल मूल में जैन ही हैं !

- गौरव जैन
gouravj132@gmail.com


अग्रवाल उत्तर भारत की सम्पन्न व शिक्षित वैश्य जाति है. इसने भारत देश के उत्थान में अपना अविस्मरणीय योगदान दिया है. इस जाति के अनुयायी आम तौर पर हिंदू व जैन दोनों धर्मों के पालक रहें हैं.

अग्रवाल जाति का इतिहास राजा अग्रसेन से शुरु होता है.  उनका राज्य महाभारत काल में हरियाणा प्रदेश के हिसार-रोहतक क्षेत्र में विस्तृत था. इस जाति की उत्पत्ति के संबंध में जितने भी कथानक है वह सभी यूं तो काल्पनिक ही है, पर उनपर अगर शोध हो तो वह निश्चित ही अग्रवाल जाति को प्रारंभ से जैन धर्म से जोड़ेंगे. वस्तुतः अग्रवाल भारत की मूल जाति रही है जो विदेशी आर्यो के अत्याचारों से पीड़ित होकर वैश्य वर्ण में आ गई.  इसका ही विवेचन हम यहां करेंगे.

परवर्ती वैदिक साहित्य में राजा अग्रसेन की कथा का वर्णन आता है जिसके अनुसार वह महालक्ष्मी के उपासक थे और सूर्यवंशी थे. उन्होंने एक बार अश्वमेध यज्ञ भी किया था और उसमें बलि देने की बात आई तो उन्होने इससे मना कर दिया. बलि नहीं देने के कारण ही उन्हें ब्राह्मणों ने क्षत्रिय वर्ण से बाहर कर दिया तब अग्रसेन राजा ने वैश्य वर्ण स्वीकार किया.

एक और वैदिक कथानुसार राजा अग्रसेन जब अपने लिए नई राजधानी की खोज में निकले तब उन्हें वर्तमान अग्रोहा के पास (जो उस समय घनघोर जंगल था) एक जगह शेर व गाय एक ही घाट पर जल पीते दिखे. राजा अग्रसेन ने सोचा जहां पवित्र मैत्री व अहिंसा हिंसक जानवरो में भी हो, वहां अवश्य ही हमे राजधानी स्थापित करना चाहिए. तीर्थंकर के समवशरण में भी शेर व गाय एक ही घाट पर पानी पीते है. संभव है कि उस समय वहां से तीर्थंकर का समवशरण गुजरा हो जिसके फलस्वरुप गाय व सिंह एक जगह जलपान कर रहे थे.

इससे यह तथ्य सटीक हो जाता है अग्रसेन राजा कुल परम्परा से शाकाहारी थे एवं वह बाकी राजाओं की तरह आर्य ब्राह्मणों के विचारो उन्हें मान्य नहीं थे. उनका अहिंसा में भरपूर विश्वास था.

अग्रसेन राजा के 18 पुत्रो के नाम पर 18 गोत्रों के नाम पडे इन में से 3 गोत्र आज भी परवार जैनों में व अग्रवालो में समान है ( गोयल, कांसल, बांसल). इससे भी इनकी जैन धर्म से साम्यता ज्ञात होती है.

यह कथा इतिहास काल के पूर्व की है जिसके संबंध में प्राचीन ग्रंथों का अभिप्राय अनुसार अध्ययन ही प्रमाण है.

अग्रोहा के पुरातत्व की ओर दृष्टि करे तो वहां जो खुदाई हुई है उसमें जितने भी प्राचीन सिक्के मिल गए हैं उन सब पर प्राकृत भाषा में लिखा गया है. एक सिक्के पर  एक ओर वृषभ का चिह्न व दूसरी ओर प्राकृत भाषा में अग्र गणराज्य का उल्लेख है. प्राकृत भारत की सबसे प्राचीन भाषा रही है. तीर्थंकरों ने अपने प्रवचन इसी भाषा में दिए.

वास्तव में अग्रोहा यह स्थान सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़ा हुआ स्थान था. कुछ विद्वानों के अनुसार प्राचीन काल के पणि लोग, जिनका ऋग्वेद में वर्णन आया है, वास्तव में आजके अग्रवालों के पूर्वज थे. ऋग्वेद के अनुसार यह पणि लोग  व्यापार करने में माहिर थे और समुद्री व्यापार भी करते थे. यह पणि लोग संपन्न व् अहिंसक थे और हिंसक यज्ञों का विरोध करते थे. 

आचार्य भद्रबाहु द्वितीय के शिष्य लोहाचार्य (एक पट्टावली अनुसार आचार्य समन्तभद्र)  भद्दिलपुर (आज का विदिशा) से विहार करते हुए अग्रोहा के निकट पधारे. उस समय इस ओर  जैनधर्म का प्रचार-प्रसार बहुत था. यहां के शासक दिवाकर ने आचार्य की वंदना की व उनसे प्रतिबोध पाकर जैन धर्म के प्रति श्रद्धा और दृढ की.

प्राचीन काल में जिस धर्म का पालक राजा होता था उसी धर्म को प्रजा भी मानती थी, इसी कारण उस क्षेत्र में रहने वाले सभी जाति के निवासियो ने जैन धर्म का पालन करना शुरु कर दिया. बाद में यहां के सभी लोगो ने मिलकर अग्रवाल जाति बनाई. उन्हें आचार्य ने काष्टासंघी नाम दिया तब से लेकर अब तक काष्टासंघ की पीठ पर बनने वाले सभी भट्टारक अग्रवाल कुलोत्पन्न ही होते थे. यह घटना दूसरी शताब्दी के आसपास की है.

अब तक चंपापुर(बिहार), ग्वालियर, तिजारा(राजस्थान) आदि कई स्थानों से खुदाई में अग्रवाल, अग्रोतक आदि प्रशस्ति लिखी जैन मूर्तियां प्राप्त हुई है. सम्राट अकबर के काल में साहू टोडर अग्रवाल ने मथुरा में 500 से अधिक जैन स्तूप बनवाए थे. अग्रोहा में भी खुदाई में जैन स्तूप निकले है. जैन धर्म में तीर्थंकरो की निर्वाण स्थली, मुनियों की समाधि स्थली पर स्तूप बनाने की परंपरा प्राचीनतम रही है. अग्रवाल समाज में इस परंपरा का पालन मुगलकाल तक जारी रहा.


अग्रवाल वैष्णव धर्मी कैसे बने


मुगलकाल मे जब जैन धर्मियों पर बहुत संकट आया. ऐसे समय में उत्तर भारत में जैन मुनियों का विहार खत्म हो गया. तब पुष्टिमार्गीय सम्प्रदाय के संत वल्लभाचार्य ने अग्रवाल वैश्यो का वैष्णव धर्म में धर्मान्तरण करवाया. यह कार्य आजादी के बाद तक चलता रहा. हरियाणा में हजारो जैन अग्रवाल आर्य समाजी बन गए. लाला लाजपतराय जैन अग्रवाल थे पर आर्य समाज से जुड़कर उन्होंने जैन धर्म त्याग दिया. आज भी कई वृद्ध वैष्णव अग्रवाल यह बताते है कि हम बचपन में भाद्रपद मास में जैन मंदिर जाते थे. बाद में हमने जैन और वैष्णव दोनो धर्मो को एक ही मानकर जैन गुरु का सानिध्य नहीं मिलने के कारण वैष्णव धर्म का पालन करना शुरु कर दिया.

कोलकाता के प्रसिद्ध बेलगछिया जैन मंदिर के निर्माता अग्रवाल श्रेष्ठी थे ऐसे कई विशाल मंदिरो का निर्माण अग्रवाल जैन बंधूओ ने करवाया था पर आज सभी जैन धर्म से परिचय टूटने के कारण वैष्णव धर्मी हो गए.
आज वैज्ञानिक युग है ऐसे समय में वास्तविक इतिहास को समझकर युवाओ को अपने मूलधर्म के प्रति श्रद्धा बढानी चाहिए व जैन धर्म का अनुसरण करना चाहिए. 

वस्तुतः देखा जाए तो अग्रवाल समाज की अहिंसा प्रियता, इनका शाकाहारी होना, इनकी जैन समाज से काफी समानता होना और इनके जैन अग्रवालों के साथ विवाह संबंध होना इन्हें जैन घोषित करती है.

वैसे आज भी इस समाज के कई लोग जैन धर्म का पालन करते हैं और जैन धर्म के कई साधू और साध्वियां अग्रवाल समाज से हैं.

ग्रन्थ साभार-1. विदिशा वैभव
2.अग्रवाल और जैन धर्म
3. अग्रवाल जाति का इतिहास
4. जैन आणि हिंदू

(गौरव जैन भारत के सामाजिक इतिहास के जानकार है और एक लेखक भी हैं ).

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